मैं अंधेरे व कीचड़ में तो था पर उस साफ़-सुथरी दुनिया में भावनाओं की ऊपर से लिपा-पोती को साफ-साफ देख सकता था।
मैं देख रहा था आदमियों को ,जिनके एक ही चेहरे पर कई मुखौटे बार-बार बदल रहे रहे थे। एक साथ इतने रावण ??????? थोड़ी घबराहट हुई पर अचानक रात की कहानी मेरे दृष्टि-पटल पर घुम गई। मेरे पहचान वाले का वो एक दूसरा अजनबी सा अपरिचित चेहरा , मुझे सहमा दिया था और भाग कर मैं इसी कोठरी में अपनी सारी भावनाओं को छुपा दिया था। एवज में आँखें खामोश हो बस दो-चार आंसू बहा लिए; साथ ही मेरे यहां होने की वजह वजह भी समझ आ गयी थी मुझे।
सन्तुष्टता के भाव मेरी आँखों में आ गए थे। और मैं आराम से उसी दलदल में और तेजी से डूबने की कोशिश करने लगा। रावणों की लंका में आराम की जिंदगी की उम्मीद करने से बेहतर है , अपने इस अंधेर कोठी में सुकून से मर जाऊं।
मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई थी ,पर कोई और उसे देख पाता इससे पहले ही वो कीचड़ मेरे सर के ऊपर तक पहुँच गया था।





